अक्षय तृतीया
अक्षय तृतीया क्या है?
जो आज आरंभ हो, वह क्षय न हो
कथा
'अक्षय' का अर्थ है — जिसका कभी क्षय न हो। वैशाख शुक्ल तृतीया को किया गया दान, जप और आरंभ अक्षय फल देता है, ऐसी मान्यता है। इस तिथि से जुड़ी अनेक कथाएँ हैं।
वनवास के दिनों में जब द्रौपदी अतिथियों को भोजन कराने में असमर्थ थीं, श्रीकृष्ण ने उन्हें अक्षय-पात्र दिया — जिसमें से अन्न कभी समाप्त न होता था। इसी तिथि को निर्धन सुदामा मुट्ठी भर पोहा लेकर द्वारका पहुँचे, और कृष्ण ने उस तुच्छ भेंट के बदले उन्हें अपार समृद्धि दी। इसी दिन महर्षि व्यास ने महाभारत कहना आरंभ किया, जिसे श्रीगणेश ने लिपिबद्ध किया। भगवान परशुराम का अवतरण भी इसी तिथि को माना जाता है।
दोनों कथाओं का सार एक ही है — अक्षय वह नहीं जो संचित किया जाए, अक्षय वह है जो दिया जाए। इसीलिए परंपरा में इस दिन स्वर्ण-क्रय से कहीं अधिक बल अन्न, जल और वस्त्र के दान पर है।
मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
वसुदेव-पुत्र श्रीकृष्ण को नमन — द्वादशाक्षर मंत्र।
व्रत विधि
प्रात: स्नान कर विष्णु-लक्ष्मी का पूजन करें, तुलसी-दल अर्पित करें और विष्णु सहस्रनाम अथवा द्वादशाक्षर मंत्र का जप करें। अन्न, जल, वस्त्र, छाता अथवा शीतल पेय का दान इस दिन का मुख्य कर्म है। नया कार्य, विद्यारंभ अथवा गृह-प्रवेश शुभ माना जाता है। स्वर्ण-क्रय परंपरा में है, किंतु सामर्थ्य से अधिक नहीं — ऋण लेकर नहीं।
भोग
सत्तू, ककड़ी, गुड़-चना, आम, पंचामृत