धनतेरस
धनतेरस क्या है?
आरोग्य और समृद्धि का प्रथम दीप
कथा
समुद्र-मंथन के समय जब देव और असुर क्षीरसागर को मथ रहे थे, कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को भगवान धन्वंतरि अमृत-कलश लिए प्रकट हुए। वे आयुर्वेद के आदि आचार्य हैं — इसीलिए इस दिन को धन्वंतरि जयंती भी कहते हैं, और सच्चा 'धन' यहाँ आरोग्य है।
इसी दिन की एक और कथा है। राजा हिम के पुत्र की कुंडली में विवाह के चौथे दिन सर्प-दंश से मृत्यु लिखी थी। उसकी नवविवाहिता पत्नी ने उस रात्रि पति को सोने न दिया — द्वार पर स्वर्ण-आभूषणों और मुद्राओं का ढेर लगाकर, चारों ओर दीप जलाकर, वह रातभर कथा और गीत सुनाती रही। यमराज सर्प-रूप में आए, किंतु स्वर्ण की चकाचौंध और दीपों के प्रकाश से उनकी आँखें चौंधिया गईं। वे ढेर पर बैठकर कथा सुनते रहे और प्रात: लौट गए। पति के प्राण बच गए।
इसीलिए धनतेरस की संध्या घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण-मुखी 'यम-दीप' जलाया जाता है, और नई वस्तु — बर्तन, धातु या आभूषण — घर लाई जाती है।
मंत्र
ॐ धन्वंतरये नमः
आयुर्वेद के आदि-देव धन्वंतरि को नमन — आरोग्य की प्रार्थना।
व्रत विधि
सूर्यास्त के बाद प्रदोष-काल में पूजा करें। मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके आटे का 'यम-दीप' जलाएँ। धन्वंतरि एवं लक्ष्मी-गणेश का पूजन करें। नई धातु की वस्तु, बर्तन या आभूषण घर लाना शुभ माना जाता है — सामर्थ्य के अनुसार, ऋण लेकर नहीं।
भोग
पीली मिठाई, गुड़-धनिया, खीर, मौसमी फल