गंगा दशहरा
गंगा दशहरा क्या है?
स्वर्ग से उतरी धारा, शिव की जटा में बँधी
कथा
राजा सगर के साठ हज़ार पुत्र कपिल मुनि के शाप से भस्म हो गए थे। उनकी सद्गति तभी संभव थी जब स्वर्ग की गंगा पृथ्वी पर आकर उस भस्म का स्पर्श करें। सगर के वंशज अंशुमान और दिलीप ने प्रयास किया पर सफल न हुए।
अंतत: राजा भगीरथ ने वर्षों घोर तपस्या की। ब्रह्मा प्रसन्न हुए, किंतु संकट यह था कि गंगा का वेग पृथ्वी सह न पाती — वह धरती को चीर देतीं। तब भगीरथ ने भगवान शिव की आराधना की। शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर उनका वेग शांत किया और फिर एक धारा छोड़ी, जो भगीरथ के पीछे-पीछे चलती हुई सागर तक पहुँची और सगर-पुत्रों का उद्धार किया।
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी का यही दिवस गंगा दशहरा है। 'दशहरा' यहाँ दस पापों के हरण का सूचक है — इसीलिए इस दिन दस की संख्या से जुड़ा दान-पूजन किया जाता है। भगीरथ के अथक प्रयास से ही 'भगीरथ प्रयत्न' मुहावरा बना।
मंत्र
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी — इस जल में आपका सान्निध्य हो।
व्रत विधि
गंगा अथवा किसी पवित्र नदी में स्नान करें; सम्भव न हो तो स्नान-जल में गंगाजल मिलाकर उपर्युक्त मंत्र का पाठ करें। दस की संख्या में — दस दीप, दस फल, दस पुष्प — अर्पित करने की परंपरा है। जल-दान, प्याऊ अथवा शीतल पेय का दान इस दिन विशेष पुण्यकारी माना गया है।
भोग
सत्तू, शरबत, ककड़ी-खरबूजा, बताशे