गोवर्धन पूजा (अन्नकूट)

    गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) क्या है?

    छोटी उँगली पर टिका सात दिन का पर्वत

    कथा

    ब्रजवासी प्रतिवर्ष इंद्र की पूजा करते थे, ताकि वर्षा हो और गोचर-भूमि हरी रहे। बालक श्रीकृष्ण ने पूछा — वर्षा तो गोवर्धन पर्वत के वन और बादल देते हैं, गायें उसी की घास चरती हैं; तो पूजा उसी की क्यों न हो जो वास्तव में हमारा पालन करता है? ब्रज ने इंद्र-यज्ञ छोड़कर गोवर्धन का पूजन किया और छप्पन भोग का अन्नकूट अर्पित किया।

    अपमानित इंद्र ने प्रलयंकारी मेघों को छोड़ दिया। सात दिन तक मूसलधार वर्षा हुई। तब सात वर्ष के कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका उँगली पर उठा लिया, और समस्त ब्रज — मनुष्य, गाय, बछड़े — उसकी छाया में सात दिन सुरक्षित रहे। आठवें दिन इंद्र का अभिमान टूटा; उन्होंने क्षमा माँगी और कृष्ण को 'गोविंद' कहकर अभिषेक किया।

    कथा का मर्म सरल है: जो तुम्हारा वास्तव में पालन करता है — भूमि, गौ, वन — कृतज्ञता उसी की बनती है।

    मंत्र

    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

    वसुदेव-पुत्र श्रीकृष्ण को नमन — द्वादशाक्षर मंत्र।

    व्रत विधि

    प्रात: गोबर से गोवर्धन-पर्वत की आकृति बनाकर पुष्प, दीप और दूध से पूजन करें एवं परिक्रमा करें। घर में बने अनेक व्यंजनों का 'अन्नकूट' अर्पित करें। गौ-पूजन करें और गायों को हरा चारा खिलाएँ। यह उपवास का नहीं, कृतज्ञता और अन्न-दान का पर्व है।

    भोग

    अन्नकूट (छप्पन भोग), कढ़ी-चावल, पूरी-सब्ज़ी, मिष्ठान्न