गुरु पूर्णिमा (व्यास पूर्णिमा)
गुरु पूर्णिमा (व्यास पूर्णिमा) क्या है?
अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला
कथा
आषाढ़ पूर्णिमा को महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास का जन्म हुआ — वही जिन्होंने एक विशाल वेद-राशि को ऋक्, यजु, साम और अथर्व — चार भागों में विभक्त किया, अठारह पुराणों की रचना की, और महाभारत कहा जिसे श्रीगणेश ने लिपिबद्ध किया। इसी कारण इस दिन को 'व्यास पूर्णिमा' कहते हैं, और भारत की समस्त गुरु-परंपरा उन्हें आदि-संकलक मानकर प्रणाम करती है।
एक अन्य परंपरा के अनुसार इसी पूर्णिमा को भगवान शिव ने सप्तर्षियों को प्रथम बार योग का उपदेश दिया और 'आदि-गुरु' कहलाए।
गुरु का अर्थ ही यही है — 'गु' अर्थात् अंधकार, 'रु' अर्थात् उसे हरने वाला। इस दिन शिष्य अपने गुरु के चरण-स्पर्श कर, सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा अर्पित कर, वर्ष भर की सीख के लिए कृतज्ञता प्रकट करता है।
मंत्र
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु, गुरु ही महेश्वर; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं — उन श्री गुरु को नमन।
व्रत विधि
प्रात: स्नान कर व्यास जी एवं अपने गुरु का पूजन करें। गुरु उपस्थित हों तो चरण-स्पर्श कर वस्त्र, फल अथवा दक्षिणा अर्पित करें; न हों तो उनके चित्र अथवा पादुका का पूजन करें। गीता, रामायण अथवा गुरु-प्रदत्त ग्रंथ का पाठ करें और दिन भर सात्विक आहार लें।
भोग
खीर, फल, पंचामृत, गुड़-चना