वट सावित्री व्रत
वट सावित्री व्रत क्या है?
यमराज से तर्क जीतने वाली स्त्री
कथा
मद्र-नरेश अश्वपति की पुत्री सावित्री ने वनवासी राजकुमार सत्यवान को पति रूप में चुना। नारद मुनि ने चेताया — सत्यवान की आयु केवल एक वर्ष शेष है। सावित्री अडिग रहीं: वर एक बार चुना जाता है। उन्होंने वन में जाकर सास-ससुर की सेवा की और नियत तिथि से तीन दिन पूर्व निराहार व्रत आरंभ किया।
नियत दिन सत्यवान लकड़ी काटते हुए मूर्च्छित होकर सावित्री की गोद में गिर पड़े। यमराज स्वयं उनके प्राण लेने आए। सावित्री उनके पीछे चल पड़ीं। यम ने लौट जाने को कहा; सावित्री ने धर्म, सत्य और सहवास पर ऐसे विवेकपूर्ण वचन कहे कि यम प्रसन्न हो उठे और वर माँगने को कहा — पति के प्राण छोड़कर।
सावित्री ने पहले ससुर की खोई दृष्टि और राज्य माँगा, फिर पिता के लिए सौ पुत्र, और अंत में अपने लिए सौ पुत्र। यम ने 'तथास्तु' कह दिया — और तब सावित्री ने स्मरण कराया कि सत्यवान के बिना यह वर असंभव है। वचनबद्ध यमराज को सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े। यह सब वट-वृक्ष की छाया में हुआ, इसीलिए व्रत का नाम वट सावित्री है।
मंत्र
ॐ सावित्र्यै नमः
देवी सावित्री को नमन — निष्ठा और विवेक की प्रतीक।
व्रत विधि
प्रात: स्नान कर वट-वृक्ष के नीचे सावित्री-सत्यवान का पूजन करें। वृक्ष के तने पर कच्चा सूत लपेटते हुए 108 (अथवा सामर्थ्य अनुसार 7 या 21) परिक्रमा करें, जल एवं भीगे चने अर्पित करें और सावित्री-कथा सुनें। दिन भर निर्जल अथवा फलाहार व्रत; संध्या को कथा-श्रवण के पश्चात् पारण करें।
भोग
भीगे चने, गुड़, आम, पूरी-पुआ, बरगद के पत्ते पर रखा प्रसाद