Mohini Ekadashi
मोहिनी एकादशी
सोमवार, 27 अप्रैल 2026
What is Mohini Ekadashi?
Frees one from delusion (moha); the story of Dhrishtabuddhi.
Mohini एकादशी व्रत कथा
वन मंदिर द्वारा पुनर्कथित · 2026-08-06 को सत्यापित · 6 स्रोत
अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा — "हे मधुसूदन! वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है और इस पर व्रत करने की विधि क्या है? कृपया यह सब मुझे विस्तार से बताइए।"
श्रीकृष्ण ने कहा कि वे महर्षि वशिष्ठ द्वारा श्रीरामचन्द्रजी को सुनाई गई एक कथा दोहराएँगे। एक बार श्रीराम ने कहा था — "हे गुरुश्रेष्ठ! मैंने जननन्दिनी सीताजी के वियोग के कारण बहुत कष्ट सहे हैं, तो मेरे दुख कैसे दूर होंगे? कृपया मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जो मेरे समस्त पापों और कष्टों का नाश कर दे।"
वशिष्ठजी ने उत्तर दिया — "हे श्रीराम! आपने बहुत उत्तम प्रश्न किया है। आपकी बुद्धि अत्यन्त कुशाग्र और पवित्र है। आपके नाम स्मरण मात्र से ही मनुष्य पवित्र हो जाता है। आपने यह उत्तम प्रश्न जनहित में पूछा है। मैं आपका अभिनन्दन करता हूँ।" उन्होंने बताया कि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी कहा जाता है, इस पर व्रत करने से समस्त पाप और कष्ट नष्ट हो जाते हैं, और इसके प्रभाव से मनुष्य मोह-माया के जाल से मुक्त हो जाता है। अतः जो दुखी और व्यथित हो उसे यह व्रत अवश्य करना चाहिए।
प्राचीन काल में सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नामक एक नगरी थी, जिस पर द्युतिमान नाम का राजा शासन करता था। उस नगरी में धनपाल नामक एक धनी वैश्य रहता था, जो अत्यन्त धार्मिक और नारायण का भक्त था। उसने यात्रियों की सुविधा के लिए मार्गों पर अनेक विश्रामगृह, तालाब और धर्मशालाएँ बनवाई थीं। उसके पाँच पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़ा अत्यन्त पापी था और अपना समय द्यूत-क्रीड़ा में व्यतीत करता था। वह किसी को नहीं मानता था, और अपना अधिकांश धन मद्य और मांस पर लुटाता था। जब बहुत समझाने पर भी वह सही मार्ग पर नहीं आया, तो उसके पिता, भाइयों और सम्बन्धियों ने उसकी भर्त्सना कर उसे घर से निकाल दिया। तब वह अपने आभूषण और वस्त्र बेचकर जीवन-यापन करने लगा।
जब उसका धन समाप्त हो गया, तो वेश्याओं और उसके दुष्ट मित्रों ने भी उसका साथ छोड़ दिया। भूख और प्यास से व्याकुल होकर, वह चोरी करने लगा और रात में चोरी करके अपना पेट पालने लगा। एक बार वह पकड़ा गया, और वैश्य का पुत्र होने के कारण सैनिकों ने उसे छोड़ दिया; किन्तु दूसरी बार पकड़े जाने पर उन्होंने उसका कोई लिहाज़ नहीं किया, बल्कि उसे राजा के समक्ष प्रस्तुत कर सारा वृत्तान्त सुनाया। राजा ने उसे कारागार में डाल दिया, और वहाँ राजा की आज्ञा से उसे अनेक यातनाएँ दी गईं, और अन्ततः उसे नगर से निष्कासित करने का आदेश दे दिया गया। दुखी होकर वह वहाँ से चला गया।
अब वह वन में पशु-पक्षियों का वध करके अपना पेट भरने लगा। वह बहेलिया बन गया और धनुष-बाण से वन के निर्दोष जीवों को मारता, उन्हें खाता और बेचता। एक बार, भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह भोजन की खोज में निकला और कौण्डिन्य मुनि के आश्रम जा पहुँचा।
यह वैशाख का मास था, और कौण्डिन्य मुनि गंगा स्नान करके लौट रहे थे। मुनि के गीले वस्त्रों की कुछ बूँदें उस पापी पर गिरीं, और उस स्पर्श मात्र से उसमें कुछ सद्बुद्धि का उदय हुआ। वह समीप आया, हाथ जोड़कर बोला — "हे महात्मन्! मैंने अपने जीवन में अनेक पाप किए हैं, कृपया मुझे उन पापों से मुक्त होने का कोई सरल और बिना धन का उपाय बताइए।"
मुनि ने कहा — "तुम ध्यान से सुनो, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करो। इस एकादशी का नाम मोहिनी है। इसका व्रत करने से तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे।"
वह अत्यन्त प्रसन्न हुआ, और मुनि द्वारा बताई गई विधि के अनुसार उसने मोहिनी एकादशी का व्रत किया। उस व्रत के प्रभाव से उसके समस्त पाप नष्ट हो गए, और अन्त में वह गरुड़ पर आरूढ़ होकर विष्णुलोक को गया।
जो कोई इस व्रत को रखता है, या इसकी महिमा को सुनता या पढ़ता है, वह मोह के जाल से मुक्त हो जाता है और भगवान विष्णु के धाम को प्राप्त होता है।
This katha has been edited by One Mandir for readability only. The names, numbers, places, sequence of events and the words spoken by the deities and sages are reproduced as they appear in the sources below — nothing has been added, removed or reinterpreted. Compiled from publicly available published sources and cross-verified across at least three of them. Please read the original texts at the links provided.
यह कथा केवल पठनीयता के लिए वन मंदिर द्वारा संपादित की गई है। नाम, संख्याएँ, स्थान, घटनाओं का क्रम तथा देवताओं और ऋषियों के कहे गए वचन नीचे दिए गए स्रोतों के अनुसार ही हैं — कुछ भी जोड़ा, हटाया या बदला नहीं गया है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध प्रकाशित स्रोतों से संकलित तथा कम से कम तीन स्रोतों से सत्यापित। कृपया दिए गए लिंक पर मूल पाठ अवश्य पढ़ें।
- Drik Panchangdrikpanchang.comtext follows this
- ISKCON Bangaloreiskconbangalore.orgprimary source
- ISKCON Desire Treeiskcondesiretree.comprimary source
- MyPanditmypandit.comcorroborating
- Prokeralaprokerala.comcorroborating
- Rudraksha Ratnarudraksha-ratna.comcorroborating
Puja Vidhi
- 1Dashami (day before): one satvik meal before sunset; no grains from evening.
- 2Ekadashi morning: bathe, then take the sankalp (vow) before Vishnu.
- 3Offer tulsi leaves, fruit, incense, a ghee lamp and yellow flowers.
- 4Chant 'Om Namo Bhagavate Vasudevaya'; read the Ekadashi katha.
- 5Fast per your capacity — nirjala (waterless), phalahar (fruit), or one satvik meal.
- 6Jagaran — stay awake through the night in bhajan and kirtan.
- 7Dwadashi: break the fast within the parana window, after giving food in charity.
क्या करें · Do's
- सूर्योदय से पूर्व स्नान और संकल्प।
- तुलसी दल अर्पित करें — किंतु एकादशी के दिन तुलसी न तोड़ें (एक दिन पूर्व तोड़ लें)।
- विष्णु सहस्रनाम या 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप।
- एकादशी कथा का सस्वर पाठ।
- अन्न, वस्त्र या दक्षिणा का दान।
- सत्य, संयम और क्षमा का पालन।
क्या न करें · Don'ts
- अन्न वर्जित — विशेषकर चावल का पूर्ण त्याग।
- प्याज, लहसुन और मांसाहार वर्जित।
- मद्य व नशा वर्जित।
- एकादशी के दिन तुलसी पत्र न तोड़ें।
- दिवा-शयन (दिन में सोना) वर्जित।
- क्रोध, कटु वचन, निंदा और कलह से बचें।
- बाल/नाखून न काटें; क्षौर कर्म वर्जित।
- पारण मुहूर्त के बाहर व्रत न खोलें।